✒️इस वर्ष भारत में एल नीनो (El Niño) के कारण मानसून देर से आया। जब बारिश शुरू हुई, तो वह अत्यधिक तीव्र थी। मुंबई और सूरत जैसे शहरों में कुछ ही दिनों में एक महीने जितनी वर्षा हो गई। वहीं असम और ओडिशा में भीषण बाढ़ आई, जिससे जन-धन की भारी हानि हुई। इसी प्रकार चीन के गुआंग्शी, शान्शी और गांसू जैसे प्रांत भी अत्यधिक वर्षा और बाढ़ से प्रभावित हुए।
◾ऐसी चरम मौसमीय घटनाएँ अब सामान्य होती जा रही हैं। ये दोनों देशों की आर्थिक वृद्धि, खाद्य सुरक्षा और जन-स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुकी हैं।
◾विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वातावरण और महासागरों का तापमान बढ़ रहा है, जिससे कम समय में अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं। ऐसे में भारत और चीन के लिए इन आपदाओं से निपटना और उनसे शीघ्र उबरने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। यही स्थिति दोनों देशों के बीच सहयोग का नया अवसर भी बन सकती है।
🔵समान जलवायु चुनौतियाँ
◾भारत और चीन दोनों कई समान समस्याओं का सामना कर रहे हैं—
- तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण।
- आर्द्रभूमियों (Wetlands) और जंगलों का कम होना।
- कंक्रीट के बढ़ते निर्माण।
- पुरानी जल निकासी (Drainage) व्यवस्था।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की कमी।
- हरित क्षेत्रों में कमी।
इन कारणों से जलभराव, बाढ़, हीटवेव और सूखे जैसी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं।
◾तटीय शहरों को समुद्र स्तर में वृद्धि, चक्रवात और भारी वर्षा का खतरा है, जबकि अंदरूनी शहरों में हीटवेव, सूखा और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं।
◾इन समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिक सहयोग, नई तकनीक, स्थानीय प्रशासन की क्षमता और समुदाय की भागीदारी आवश्यक है।
🔵भारत-चीन सहयोग की नई संभावना
◾अप्रैल 2026 में चीन के विशेष जलवायु दूत (Special Envoy for Climate Change) के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली का दौरा किया। इससे संकेत मिलता है कि दोनों देशों के बीच जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग की संभावना अभी भी बनी हुई है।
◾हालाँकि हरित प्रौद्योगिकी (Green Technology) और महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) जैसे क्षेत्रों में आर्थिक प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक तनाव मौजूद हैं।
◾फिर भी आपदा प्रबंधन (Disaster Mitigation) और शहरी सहनशीलता (Urban Resilience) ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ कम जोखिम के साथ सहयोग किया जा सकता है।
🔵पूर्व में हुए सहयोग
◾1990 के दशक से 2020 तक भारत और चीन के बीच कई संयुक्त बयान (Joint Statements) और समझौता ज्ञापन (MoUs) हुए।
इनमें सहयोग के प्रमुख क्षेत्र थे—
- बाढ़ और सूखे पर शोध।
- भूकंप संबंधी जानकारी साझा करना।
- जलविज्ञान (Hydrology)।
- समुद्री एवं भूकंपीय आँकड़ों का आदान-प्रदान।
- शहरी नियोजन।
- अपशिष्ट प्रबंधन।
- सीवेज उपचार।
- जल दक्षता।
- क्षमता निर्माण।
◾दिल्ली–बीजिंग, मुंबई–शंघाई और चेन्नई–चोंगकिंग जैसे सिस्टर सिटी (Sister City) समझौते भी हुए, लेकिन राजनीतिक तनाव के कारण इनका ज़मीनी प्रभाव सीमित रहा।
🔵एक-दूसरे से सीखने के अवसर
◾चीन ने शहरी और ग्रामीण विकास योजनाओं में जलवायु सहनशीलता को शामिल किया है। वहाँ डेटा आधारित योजना, बेहतर परिवहन, आवास और ड्रेनेज व्यवस्था पर ज़ोर दिया गया है।
◾भारत ने कई सफल पहलें की हैं—
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System)
- हीट एक्शन प्लान (Heat Action Plan)
- कूल रूफ (Cool Roof) कार्यक्रम
- प्रकृति आधारित समाधान (Nature-based Solutions)
दोनों देश एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकते हैं।
◾ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ कृषि, खाद्य सुरक्षा, हिमालयी ग्लेशियरों का संरक्षण और जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन भी सहयोग के महत्वपूर्ण क्षेत्र हो सकते हैं।
🔵वित्तीय चुनौती
◾जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) की सबसे बड़ी चुनौती वित्त (Finance) है।
दोनों देश मुख्य रूप से सरकारी धन पर निर्भर हैं।
इस कमी को दूर करने के लिए—
- निजी निवेश
- ब्लेंडेड फाइनेंस (Blended Finance)
- नगर निगम बॉन्ड (Municipal Bonds)
- क्रेडिट एन्हांसमेंट
जैसे विकल्पों को बढ़ावा देना होगा।
भारत और चीन यदि इन क्षेत्रों में अनुभव साझा करें, तो दोनों देशों के साथ-साथ पूरे Global South को लाभ मिल सकता है।
🔵निष्कर्ष
◾जलवायु परिवर्तन किसी एक देश की समस्या नहीं है। इसकी चुनौतियाँ सीमाओं से परे हैं। इसलिए भारत और चीन के बीच सहयोग केवल द्विपक्षीय संबंधों को ही मजबूत नहीं करेगा, बल्कि एशिया और वैश्विक दक्षिण के लिए भी एक सकारात्मक उदाहरण बनेगा।
◾भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग दोनों देशों के लिए "कम जोखिम, अधिक लाभ (Low-risk, Win-win)" वाला मार्ग सिद्ध हो सकता है।
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