✍️भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली लंबे समय से सुधार की प्रतीक्षा में रही है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा, शोध की गुणवत्ता, संस्थागत जवाबदेही और समावेशी पहुंच जैसे मुद्दे बार-बार सामने आते रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक’ को एक बड़े संरचनात्मक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा के नियमन, मानकों और वित्तीय ढांचे को एकीकृत करना है। ◾हालांकि, इस विधेयक के प्रावधानों ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़े किए हैं—विशेषकर संघीय संतुलन, संस्थागत स्वायत्तता और सामाजिक न्याय के संदर्भ में। ✒️ विधेयक की पृष्ठभूमि और उद्देश्य ◾राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने उच्च शिक्षा में व्यापक बदलावों की रूपरेखा प्रस्तुत की थी। उसी दिशा में यह विधेयक नियामक ढांचे को सरल और प्रभावी बनाने का प्रयास करता है। इसमें मान्यता (accreditation), नियमन (regulation) और वित्तीय सहायता जैसे पहलुओं को सुव्यवस्थित करने की बात की गई है। उद्देश्य यह है कि उच्च शिक्षा संस्थान अधिक प्रतिस्पर्धी, पारदर्शी और परिणाम-उन्मुख बनें। ◾परंतु, किसी भी सुधार की सफलता केवल उसकी मंशा पर नहीं, ...
✍️भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भूमिका पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बदली है। अब वे केवल “मतदाता” नहीं रहीं, बल्कि चुनावी राजनीति की दिशा तय करने वाली एक निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं। हाल ही में सामने आए आंकड़े—विशेषकर असम, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के—यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि महिलाओं की मतदान में भागीदारी लगातार बढ़ रही है, कई जगहों पर तो पुरुषों से भी अधिक हो गई है। इसके बावजूद, एक विडंबना बनी हुई है—विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अब भी बेहद सीमित है। ◾यह विरोधाभास ही आज के राजनीतिक विमर्श का केंद्र है: क्या भारत में महिलाएं केवल वोट बैंक बनकर रह जाएंगी, या वे नीति-निर्माण की सक्रिय भागीदार भी बनेंगी? Source - The Hindu ✒️ महिला मतदाताओं का उभार: एक नई राजनीतिक हकीकत ◾पिछले तीन दशकों के चुनावी रुझानों को देखें तो एक स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है। 1990 के दशक में जहां महिलाओं की मतदान दर पुरुषों से काफी कम थी, वहीं अब स्थिति उलटती दिख रही है। ◾असम में 1991 में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से लगभग 1.48% कम थी, लेकिन 2021 तक यह अंतर उलटकर +0.41% हो गया। ◾केर...