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भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC): अवसर और चुनौतियाँ

✍️हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ा है। Israel और United States द्वारा Iran के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बाद पूरे क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों की श्रृंखला शुरू हो गई है। इससे क्षेत्रीय स्थिरता के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा बाज़ार भी प्रभावित हो रहे हैं।


इस संकट की ऐतिहासिक जड़ें प्रथम विश्व युद्ध के समय तक जाती हैं। Sykes-Picot Agreement और Balfour Declaration जैसे समझौतों ने मध्य पूर्व की राजनीतिक सीमाओं को इस तरह तय किया, जिसने आने वाले समय में कई संघर्षों को जन्म दिया। इसके बाद इज़रायल के गठन और अरब-इज़रायल युद्धों ने क्षेत्र में अस्थिरता को और गहरा किया।
वर्तमान संकट में केवल राज्य ही नहीं बल्कि कई प्रॉक्सी समूह भी सक्रिय हैं, जैसे Hezbollah और Hamas। इन संगठनों की भागीदारी ने संघर्ष को क्षेत्रीय स्तर पर और जटिल बना दिया है।



भारत के लिए यह स्थिति विशेष महत्व रखती है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है और तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। यदि इस मार्ग में बाधा आती है तो तेल की कीमतों में वृद्धि, महंगाई और आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है।


इसके अलावा खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी कार्यरत हैं, जिनसे भारत को महत्वपूर्ण मात्रा में रेमिटेंस प्राप्त होता है। किसी बड़े संघर्ष की स्थिति में उनकी सुरक्षा और आर्थिक प्रवाह दोनों प्रभावित हो सकते हैं।


ऐसे समय में भारत के लिए संतुलित कूटनीति अत्यंत आवश्यक है। एक ओर उसके इज़रायल के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा और कनेक्टिविटी सहयोग भी महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने वाली नीति अपनानी होगी।

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