✍️भारत का संविधान सामाजिक न्याय की जिस बुनियाद पर खड़ा है, उसमें अनुसूचित जातियों (SCs) के लिए विशेष प्रावधान एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। ये प्रावधान केवल आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता के अनुभवों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण निर्णय ने यह स्पष्ट किया है कि धर्म परिवर्तन और अनुसूचित जाति की पहचान के बीच संबंध कैसे समझा जाए। यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को भी नई दिशा देता है। ✒️ मामले की पृष्ठभूमि ◾सर्वोच्च न्यायालय ने Chinthada Anand बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2026) मामले में यह कहा कि यदि कोई व्यक्ति, जो मूल रूप से अनुसूचित जाति से संबंधित था, किसी ऐसे धर्म में परिवर्तित हो जाता है जो संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में सूचीबद्ध नहीं है—जैसे कि ईसाई या इस्लाम—तो उसे SC का दर्जा नहीं मिल सकता। ◾यह निर्णय एक ऐसे व्यक्ति के मामले में आया जिसने मदिगा समुदाय (एक SC समुदाय) से होने का दावा किया, लेकिन वह ईसाई धर्म का पालन कर रहा था। न्यायालय ने स्पष...