✍️हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मंच पर हुए एक विरोध प्रदर्शन ने भारत में एक बार फिर उस बहस को जीवित कर दिया है, जो लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ी है—असहमति (dissent) की सीमा क्या होनी चाहिए और क्या विरोध प्रदर्शन देश की “राष्ट्रीय छवि” को नुकसान पहुँचाते हैं? यह प्रश्न नया नहीं है, लेकिन बदलते राजनीतिक परिवेश, मीडिया की भूमिका और राष्ट्रवाद की नई व्याख्याओं ने इसे और जटिल बना दिया है। ◾लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता; यह नागरिकों के विचार व्यक्त करने, असहमति दर्ज करने और सत्ता से सवाल पूछने की स्वतंत्रता पर भी टिका होता है। ऐसे में यह समझना ज़रूरी है कि विरोध और राष्ट्रहित के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। ✒️असहमति: लोकतंत्र की सुरक्षा वाल्व ◾किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति को एक “सुरक्षा वाल्व” माना जाता है। यह वह माध्यम है जिसके जरिए नागरिक नीतियों या निर्णयों के प्रति अपनी असहमति व्यक्त करते हैं। अगर इस वाल्व को बंद कर दिया जाए, तो असंतोष दबेगा नहीं, बल्कि विस्फोटक रूप ले सकता है। ◾भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास स्वयं असहमति की शक्ति का उदाहरण है। अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन...