✍️भारतीय लोकतंत्र की सफलता उसके तीनों स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के संतुलन पर निर्भर करती है। इनमें न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक तथा नागरिक अधिकारों का अंतिम रक्षक माना जाता है। किंतु जब न्यायपालिका स्वयं आलोचना के प्रति असहज दिखाई देती है, तब यह प्रश्न उठता है कि क्या वह अपने ही मूलभूत सिद्धांतों—पारदर्शिता, जवाबदेही और स्वतंत्रता—का पालन कर रही है? ◾हाल ही में एक शैक्षिक पुस्तक के कुछ अंशों पर प्रतिबंध लगाने की घटना ने इस बहस को पुनः प्रासंगिक बना दिया है। यह केवल एक पुस्तक का प्रश्न नहीं है, बल्कि न्यायिक पारदर्शिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक संतुलन का मुद्दा है। ✒️मूल मुद्दा: प्रतिबंध बनाम मौलिक अधिकार ◾भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। वहीं, अनुच्छेद 19(2) इस अधिकार पर “उचित प्रतिबंध” लगाने की अनुमति देता है, जैसे—मानहानि, न्यायालय की अवमानना, सार्वजनिक व्यवस्था आदि। ◾न्यायालय का तर्क यह हो सकता है कि न्यायपालिका के विरुद्ध नकारात्मक टिप्पणियाँ उसकी गरिमा और जन-विश्वास को...