✍️भारत वर्ष 2047 तक “विकसित राष्ट्र” बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये विनिर्माण, निर्यात, निवेश और रोज़गार के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन आवश्यक हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) लंबे समय से भारत की निर्यात नीति के प्रमुख स्तंभ रहे हैं। इन्होंने विदेशी निवेश आकर्षित करने, उद्योगों को बढ़ावा देने तथा लाखों लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।◾हलाँकि वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिस्थितियाँ, बदलती व्यापार नीतियाँ, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार तथा हरित विनिर्माण की बढ़ती आवश्यकता यह संकेत देती हैं कि पारंपरिक SEZ मॉडल में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। अब समय केवल “निर्यात क्षेत्र” विकसित करने का नहीं, बल्कि ऐसे आर्थिक केंद्र बनाने का है जो भारत को वैश्विक उत्पादन और नवाचार शक्ति के रूप में स्थापित कर सकें।
🔵भारत में SEZ की भूमिका
1. निर्यात वृद्धि का आधार
◾विशेष आर्थिक क्षेत्रों ने भारत के निर्यात को गति देने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
◾IT/ITES, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग क्षेत्र ने निर्यात बढ़ाया।
◾भारत के कुल निर्यात में SEZ का योगदान लगातार बढ़ रहा है।
◾वैश्विक कंपनियों के लिये भारत एक भरोसेमंद उत्पादन केंद्र बनकर उभरा है।
2. रोज़गार सृजन में योगदान
◾SEZ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार से रोज़गार उपलब्ध कराते हैं।
◾लाखों युवाओं को उद्योग एवं सेवा क्षेत्र में अवसर प्राप्त हुए।
◾महिला कार्यबल की भागीदारी में वृद्धि हुई।
◾शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ीं।
3. विदेशी निवेश आकर्षण
◾विशेष कर छूट, बेहतर अवसंरचना और आसान प्रक्रियाओं ने विदेशी निवेश को आकर्षित किया।
◾इलेक्ट्रॉनिक्स एवं डेटा सेवाओं में निवेश बढ़ा।
◾वैश्विक कंपनियों ने चीन के विकल्प के रूप में भारत को देखना शुरू किया।
🔵SEZ के सामने उभरती चुनौतियाँ
1. कर लाभों का कम होना
◾पहले SEZ की सबसे बड़ी ताकत कर प्रोत्साहन थे, लेकिन अब यह लाभ सीमित हो चुके हैं।
◾न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) ने निवेश आकर्षण को प्रभावित किया।
◾घरेलू टैरिफ क्षेत्रों को भी कर लाभ मिलने लगे हैं।
◾PLI योजनाओं ने निवेश का रुख बदल दिया।
2. भूमि और अवसंरचना का अल्प उपयोग
◾कई SEZ में बड़ी मात्रा में भूमि अनुपयोगी पड़ी है।
◾कई परियोजनाएँ अधूरी रह गईं।
◾भूमि अधिग्रहण के बाद उद्योग स्थापित नहीं हो पाए।
◾इससे संसाधनों की बर्बादी और स्थानीय असंतोष दोनों बढ़े।
3. घरेलू बाज़ार से सीमित जुड़ाव
◾SEZ मुख्यतः निर्यात आधारित मॉडल पर बने थे।
◾घरेलू बिक्री पर शुल्क लगने से प्रतिस्पर्द्धा प्रभावित होती है।
◾विदेशी आयातित वस्तुएँ कई बार सस्ती पड़ती हैं।
◾इससे भारतीय उद्योगों की क्षमता सीमित होती है।
4. क्षेत्रीय असंतुलन
◾भारत में अधिकांश SEZ IT आधारित हैं।
◾विनिर्माण आधारित SEZ अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पाए।
◾पूर्वी और मध्य भारत जैसे क्षेत्रों में औद्योगिक विकास सीमित रहा।
🔵हालिया सुधार और सरकारी पहल
1. DESH ढाँचे की ओर बदलाव
◾सरकार SEZ मॉडल को अधिक लचीला और ◾आधुनिक बनाने का प्रयास कर रही है।
◾“Development of Enterprise and Service Hubs (DESH)” मॉडल पर जोर।
◾राज्यों की भागीदारी बढ़ाने की योजना।
◾निर्यात के साथ घरेलू उत्पादन को भी प्रोत्साहन।
2. हाई-टेक और सेमीकंडक्टर SEZ
◾भारत अब उन्नत तकनीकी विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
◾सेमीकंडक्टर उत्पादन हेतु नए क्षेत्र विकसित किये जा रहे हैं।
◾इलेक्ट्रॉनिक्स एवं चिप निर्माण में निवेश बढ़ रहा है।
✒️वैश्विक चिप संकट के बाद भारत “टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन” में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।
3. हरित औद्योगिक क्षेत्र
◾भविष्य की अर्थव्यवस्था टिकाऊ विकास पर आधारित होगी।
◾सौर ऊर्जा आधारित औद्योगिक पार्क विकसित हो रहे हैं।
◾ESG मानकों के अनुरूप निवेश आकर्षित किया जा रहा है।
◾हरित हाइड्रोजन मिशन से भी SEZ को जोड़ा जा रहा है।
4. डिजिटल व्यापार सुविधा
◾डिजिटल अवसंरचना के माध्यम से व्यापार प्रक्रियाओं को सरल बनाया जा रहा है।
◾ICEGATE एवं सिंगल विंडो सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है।
◾ई-कॉमर्स निर्यात को बढ़ावा दिया जा रहा है।
◾MSME को वैश्विक बाज़ार तक पहुँच मिल रही है।
🔵आगे की रणनीति
1. SEZ को “आर्थिक हब” में बदलना
◾SEZ को केवल निर्यात क्षेत्रों तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
◾इन्हें नवाचार, अनुसंधान और स्टार्टअप केंद्र बनाया जाए।
◾घरेलू उद्योगों के साथ समन्वय बढ़ाया जाए।
2. मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स विकास
◾PM गति शक्ति योजना के साथ बेहतर समन्वय आवश्यक है।
◾बंदरगाह, रेलवे और हवाई संपर्क को मजबूत किया जाए।
◾लॉजिस्टिक्स लागत कम कर वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाई जाए।
3. कौशल आधारित विकास
◾नई अर्थव्यवस्था के अनुरूप कुशल मानव संसाधन तैयार करना आवश्यक है।
◾AI, रोबोटिक्स, डेटा एनालिटिक्स और चिप डिजाइन पर प्रशिक्षण।
◾उद्योग-विश्वविद्यालय साझेदारी को बढ़ावा।
4. स्थानीय उद्योगों का एकीकरण
◾MSME और स्थानीय उद्योगों को SEZ आपूर्ति शृंखला से जोड़ना होगा।
◾“मेक इन इंडिया” को मजबूती मिलेगी।
◾ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी उद्योगों को वैश्विक अवसर प्राप्त होंगे।
5. स्थिर और पारदर्शी नीति
◾निवेशकों का विश्वास बनाए रखने हेतु नीति निरंतरता आवश्यक है।
◾कर विवाद कम किए जाएँ।
◾नियमों को सरल और पारदर्शी बनाया जाए।
◾त्वरित स्वीकृति प्रणाली विकसित की जाए।
🔵निष्कर्ष
◾विशेष आर्थिक क्षेत्र भारत की आर्थिक प्रगति के महत्त्वपूर्ण साधन रहे हैं, किंतु वर्तमान समय में इनके स्वरूप और कार्यप्रणाली में परिवर्तन आवश्यक हो गया है। विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये SEZ को आधुनिक, हरित, तकनीक-आधारित और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़ा बनाना होगा।
◾यदि भारत समय रहते संरचनात्मक सुधार, नीति स्थिरता और नवाचार आधारित औद्योगिक रणनीति अपनाता है, तो SEZ केवल निर्यात केंद्र नहीं बल्कि भारत की आर्थिक शक्ति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व के प्रमुख आधार बन सकते हैं।

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